मानसिक बीमारी कोई जात-पात, रंग-रूप या धर्म देख कर नहीं आती। जितना आप सोच सकते हैं, ये उससे भी आम है। हो सकता है जो अभी आपके आस पास बैठे हो वो भी किसी मानसिक बीमारी से गुज़र रहे हों। चिंता मत करो। हम यहाँ मदद करने के लिए हैं।

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Smita

मैंने इस सपने के साथ घर से भाग कर शादी की थी कि मेरी शादीशुदा ज़िंदगी सबसे ख़ूबसूरत होगी। लेकिन दुर्भाग्य से, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जैसे मैंने सोचा था।मैं एक ऐसे रिश्ते में फंस गई थी जहाँ मैं रोज़ शारीरिक और मानसिक शोषण से गुज़र रही थी। हर दिन चिल्लाना, गाली गलोच, चीज़ें तोड़ना, कपड़े फाड़ना, खाना फेंकना और मेरे बच्चों की बुरी तरह पिटाई करना- यह सब मेरे जीवन का हिस्सा बन गया था। मैं हर रोज़ “तू बेकार है”, “एक काम भी ठीक से नहीं कर सकती”, “तू बेवक़ूफ़ है”, “तू किसी चीज़ के लायक़ नहीं है" जैसे शब्द सुनती थी। उन्हें रोज़ रोज़ सुन कर मैं उन पर विश्वास करने लगी थी।मुझे नहीं पता था कि मैं हर रोज़ इस शोषण का सामना कैसे करूँ। मुझे लगा जैसे इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। मैं इस क़दर डिप्रेशन का शिकार हो गई कि मेरी 9 साल की बेटी मुझे नहलाती थी। मैं इतने गहरे डिप्रेशन में जा चुकी थी कि मैं बड़बड़ाने लग गई और एक शब्द भी सही तरीक़े से नहीं बोल पाती थी। और एक दिन मैंने प्रभु यीशु मसीह की आवाज़ को सुना। सच कहूँ तो उन्होंने मुझसे पहले भी बात की होगी पर मैंने जैसे अपनी आँखें ही मूँद ली थी। फिर भी जिस दिन मैं ईश्वर से जवाब की तलाश में थी, आशा की तलाश में, एक रास्ता खोज रही थी, उन्होंने भजन सहिंता 139: 13 -18 से मुझसे बात की और यीशु के इस वादे ने मेरा जीवन बदल दिया। मुझे अचानक एहसास हुआ कि मैं सुंदर और आश्चर्यजनक रूप से यीशु द्वारा बनाई गई हूँ, कि उसने मुझे मेरी माँ के गर्भ में बुना था और उसने मेरे दिनों को बनाया था।

और मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं वो नहीं हूँ जो मैं अपने बारे में सोचती और जो दूसरे बोलते थे।मैं ईश्वर का बच्चा हूँ और उसने मुझे परिपूर्ण बनाया है जो कि सही चीजों का निर्माता है और मैं उससे जुड़ी हुई हूं। मेरा मनोबल बढ़ा हुआ था, और मैंने यीशु के वादों में आराम करने का फैसला किया। अब मैं सच्चाई को देख सकती थी और मुझे अब कोई भी नीचे नहीं गिरा सकता है।

Salil

ये सब की शुरुआत 2008 में मेरे चाचा के देहांत के बाद हुई। वो मेरे बहुत क़रीब थे और उन्होंने मुझे जीवन की मह्त्त्व्पूर्ण बातें सीखाई थी। उनकी मौत से हमारे परिवार की जैसे नीव ही हील गयी थी। उससे अगले साल मेरे पिता का अस्थमा से देहांत हो गया। उनका डाक्टर्ज़ ने ग़लत इलाज कर दिया था। अभी मेरे पिता को गए हुए 6 से 7 महीने ही हुए थे कि एक रात मेरी माँ की छाती में अचानक से दर्द उठा। अगले दिन जब मैं उन्हें अस्पताल लेकर पहुँचा तो उन्होंने अस्पताल पहुँचते ही दम तोड़ दिया। मुझे बाद में पता चला कि उनकी ब्लड शुगर बहुत बढ़ चुकी थी और उन्हें 2 हार्ट अटैक भी पड़े थे।बस! मेरी दुनिया ख़त्म हो गयी थी।कोई भी नहीं समझ सकता मेरे अंदर क्या चल रहा है था सभी को खो देने के बाद। मैंने कितनी बार अपनी जान भी लेने की कोशिश की। अपने रिश्तदारों, यहाँ तक कि अपनी सगी बहन तक से मदद माँगी पर किसी ने भी मेरी मदद नहीं की। मैं बिलकुल अकेला पद गया था।मैं अपने अंदर से दुःख, ग़ुस्से, डिप्रेशन और शर्म से भर चुका था। मैं किसी काम में ध्यान नहीं लगा पाता था। मेरा भविष्य धुँधला पड़ चुका था।एक दिन मेरे एक दोस्त ने मुझसे चर्च चलने को कहा पर मैंने जाने से मना कर दिया। मेरे पिता बहुत ही धार्मिक इंसान थे पर मैं नास्तिक था। मैं प्रकृति के काफ़ी क़रीब था और मेरे अंदर हमेशा ये सवाल आता था कि ये इतनी सिद्ध कैसे हो सकती है।

मैंने कुछ समय बाद अपने उस दोस्त के जीवन में बहुत अच्छे बदलाव देखे। उसके जीवन में बदलाव देख कर मैं भी एक दिन उसके साथ प्रार्थना सभा में गया और जब प्रवक्ता बात कर रहा था तो मुझे ऐसा महसूस कि कोई मुझसे बात कर रहा था जो उस भीड़ का हिस्सा नहीं था। और मुझे उस दिन विश्वास हो गया कि यह वही सामर्थ है जिसने इस सृष्टि की रचना की है और उसी दिन मैंने अपना जीवन यीशु मसीह को दे दिया। और एक रात जब मैं प्रार्थना कर रहा था तो मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मेरे सारे बोझ जैसे मेरे ऊपर से किसी ने उठा लिए। मैंने पहले कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं किया था, मैं बहुत समय के बाद मुस्कुराया था और मैंने अपनी धड़कन को महसूस किया। यीशु ने मेरा हाथ थाम लिया और आज मैं उन लोगों की मदद करता हूँ जो मुश्किल समय से गुज़र रहे हैं।

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Neha

मेरे पिता ने यह कह कर कि मैं उनकी औलाद नहीं हूँ मेरा तभी तिरस्कार कर दिया था जब मैं अपनी माँ की कोक में ही थी। मेरा जन्म तिरस्कार और डर से भरे हुए माहौल में हुआ था। मेरी एक आंटी ने मुझे बताया था कि वो एक लड़की को जान से मारना चाहते थे क्योंकि मेरी माँ ने दो लड़कियों को जन्म दिया था। मुझे हमेशा यही महसूस होता था कि वो मुझे ही मारना चाहते थे।मेरे पिता बहुत शराब पीते थे और बहुत ही ग़ुस्से वाले इंसान भी थे। उन्होंने कभी मुझे पिता का प्यार नहीं दिया। उस प्यार की बजाए मुझे तिरस्कार, मार पीट और गाली गलोच का सामना करना पड़ा और इसकी वजह से मैं एक डरपोक इंसान बन गयी।2009 में मेरे पिता का कैन्सर की वजह से देहांत हो गया और मैं ख़ुद को अपने पिता की मौत का जीमेवार ठहराती थी। ये सब चीज़ें मुझे मानसिक रूप से बहुत प्रभावित करती थी और मैं अपना जीवन ख़त्म करना चाहती थी। मेरे ख़ुद के कोई दोस्त नहीं थे और सब लोग मुझे बदसूरत और बेवक़ूफ़ कहते थे। उसी दौरान मैं एक लड़के से प्यार करने लगी पर वो मेरे साथ गाली गलोच करता था और मेरे साथ ज़ोर ज़बरदस्ती भी करनी की कोशिश की। मैंने इस रिश्ते से बाहर निकलने की कोशिश की पर मैं उसके साथ रहना चाहती थी क्योंकि उसने मुझसे वादा किया था कि वो मुझसे शादी करेगा। मुझे बहुत वक़्त लगा उससे बाहर निकालने में। मेरे हालत और भी बुरे होते जा रहे थे। मैं ख़ुद को पेट में मुक्के मारती, दीवार पर अपना तब तक सर मारती जब तक दर्द महसूस ना हो। मैं ख़ुद से बहुत शर्मिंदा हो चुकी थी।2017 में मैं एक प्रार्थना सभा में गई जहाँ पर प्रवक्ता परमेश्वर के प्यार के बारे में बात कर रहे थे।

और उस वक़्त प्रभु यीशु ने मुझसे बात की कि “मैंने हमेशा प्यार और स्वीकारिता को परमेश्वर की बजाए इंसान में ढूँढने की कोशिश की है।” उस दिन मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी और मैंने अपना जीवन पूरी तरह से यीशु को सौंप दिया जिसने मेरे पापों के लिए अपनी जान दी।प्रभु यीशु मसीह ने मेरा ख़ुद को देखने का नज़रिया ही बदल दिया। और मैं जैसी हूँ वो मुझे वैसे ही प्यार करता है और वो मेरे बारे में कोई भी राय नहीं बनाता। यीशु ने मुझे आज़ाद कर दिया और मैं अब उसके प्यार को अपने जीवन में महसूस करती हूँ।

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