कर्म क्या है? क्या है कर्म के सिद्धांत? क्या कर्म के बिना फल नहीं मिलता?
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कर्म क्या है? क्या है कर्म के सिद्धांत? क्या कर्म के बिना फल नहीं मिलता?

कर्म क्या है? क्या है कर्म के सिद्धांत? क्या कर्म के बिना फल नहीं मिलता?

जीवन

कर्म क्या है? क्या है कर्म के सिद्धांत? क्या कर्म के बिना फल नहीं मिलता?

कर्म: यह मेरे जीवन को कैसे प्रभावित करेगा? क्या है इसका सिद्धांत और अर्थ? कैसे करें हम सही और गलत में फैसला? क्या मुझे बुरे कर्मो की मॉफी या क्षमा मिल सकती है? क्या है मेरा भाग्य: कर्म के बिना नहीं मिलता फल। आइए जाने इसकी सच्चाई।

कर्म: यह मेरे जीवन को कैसे प्रभावित करेगा?

“कर्म कर, फल की चिंता मत कर।”

अगर आप भारत या किसी भी पूर्वी देश के निवासी हैं तो ये बात आपने अक्सर सुनी होगी और अगर आप यह पढ़ रहे हैं तो ज़ाहिर है की आप भी जानना चाहते हैं कि कर्म आपके जीवन को कैसे प्रभावित करेगा। कर्म के सिधांत के बारे में भगवद् गीता में बताया गया है, गौतम बुद्ध ने भी कर्म के महत्व के बारे में शिक्षा दी और बौद्ध धर्म को मानने वाले कर्म में यकीन करते हैं। बहुत सारे धर्म अब कर्म के सिधांत को अपना चुके हैं। तो क्या हर सवाल का जवाब कर्म में मिल सकता है? 

कर्म का अर्थ क्या है?

कर्म के सिधांत के अनुसार हमारे कर्म और उसके पीछे का इरादा हमारे भविष्य को प्रभावित करता है। अगर हम अच्छे इरादे से कोई अच्छे काम करते हैं तो हमें अगले जन्म में उसके अच्छे फल मिलेंगे। मतलब इस जन्म में हम अपने पिछले कर्मों का फल भुगत रहें हैं। इसलिए ये शिक्षा दी जाती है कि इस जन्म में फल की अपेक्षा नही करनी चाहिए।

बुरे कर्म का पछतावा

अगर इस जन्म में हमसे बुरा काम हो गया तो क्या हमें माफी नही मिल सकती है?

एक बार जब कोई काम आपने कर दिया तब आप उसको पलट नही सकते। एक खूनी व्यक्ति अगर खून करने के बाद पछताता है तब भी वह मरे हुए व्यक्ति को ज़िंदा नही कर सकता। तो ऐसे में क्या अच्छे कर्म उसे इस पाप से छुटकारा दे सकते हैं? हम अच्छे कर्मों से अपने बुरे कर्मों को मिटा या छुपा नही सकते। 

अगर हम कर्म के सीधांत के अनुसार चलें तो हर बुरे कर्म की सज़ा हमें अगले जन्म में मिलती है और अगर ऐसा है तो हमारे साथ जो बुरा होता है, उस पर हमारा कोई भी ज़ोर नहीं। लेकिन बुरा काम करने के बाद हमें जो पछतावा होता है या अपराध भाव महसूस करते हैं, उससे कैसे छुटकरा पाया जाए?

यीशु मसीह ने कर्मों के परे माफी या क्षमा की बात कही है। अगर कोई ईसा मसीह या यीशु मसीह में अपना भरोसा रखे तो उसे अपने बुरे कर्मों की माफी मिल सकती है और इस माफी को पाने के लिए आपको कोई कर्म करने की भी ज़रूरत नही है लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है? किसी को तो पाप या गलत कर्मों की कीमत देनी ही होगी।

न्याय और क्षमा

जिसके साथ बुरा हुआ उसको न्याय तो मिलना ही चाहिए। आपने पुराण या इतिहास में पढ़ा होगा की पापों की क्षमा के लिए बलि दी जाती थी। ये प्रथा बाइबिल में बताए गये पुराने नियम से चलन में आई है जब भी किसी से कोई पाप होता था तो वह एक मासूम मेमने की बलि देकर परमेश्वर से माफी ले लेता था। इस तरह उसके पाप की सज़ा मेमना अपने उपर ले लेता था लेकिन आगे चलकर मनुष्य ने इस प्रथा का भी दुरुपयोंग किया। उसने बलि को अपने पाप की सज़ा से बचने का तरीका बना लिया, जबकि उसके मन में कोई प्रायश्चित करने की आत्मा न थी।

इसलिए परमेश्वर् ने अपने इकलौते पुत्र यीशु मसीह को मनुष्य के रूप में भेजा ताकि, वो हमारे मनुष्य मन की तरह पाप का सामना करे और उसे हराए। वो इसलिए भेजा गया ताकि वो हमारे पापों की सज़ा के लिए बलि का मेमना बन सके। जी हाँ, यीशु मसीह ने मेमने की तरह हमारे पापों के लिए जान दी, वो पृथ्वी पर इसलिए आए कि वो आपके पापों की सज़ा भुगत सकें ताकि आपको माफी मिले।

इस तरह से आप सही और ग़लत कर्मों के चक्रव्यूह से निकल पाए। किसी भी ग़लत कर्म के परिणाम को आप पलट नही सकते लेकिन आपको उस कर्म की माफी यहीं इसी जीवन में मिल सकती है। अब आपको अगले जन्म की चिंता करने की ज़रूरत नहीं क्योकि आपकी माफी के बाद आपको इस जीवन के बाद एक अनंत जीवन मिलता है।

ईसाई धर्म के बारे में एक ग़लत धारणा यह है कि वो एक पश्चमी धर्म है। 

लेकिन बाइबिल में लिखा है कि –

परमेश्वर ने जगत से (न कि पश्चमी लोंगो से) ऐसा प्रेम किया की उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे वो नाश ना हो परंतु अनंत जीवन् पाए।

कर्म की किसी भी परिभाषा या परिकल्पना में इस तरह की बात नहीं कही गयी है।

आप कोई भी पुराण उठा कर देख सकते हैं। सभी जगह पापों की क्षमा के लिए कर्मों की ही बात लिखी है। सिर्फ़ बाइबिल यह बताती है की हमें माफी, बिना कर्म के मिल सकती है यदि हम यीशु मसीह पर विश्वास करें।

एक और सवाल जो अब आपके मन में उठ रहा होगा कि –

 सही या ग़लत की पहचान कैसे हो?

बाइबिल ये बताती है की यीशु मसीह परमेश्वर के पुत्र हैं। मतलब वे खुद भी परमेश्वर से कम नहीं। हमारे गुनाहों की माफी के लिए ये ज़रूरी था कि कोई पवित्र व्यक्ति हमें माफी दे। यीशु मसीह पवित्र थे। उनमें कोई दाग नही था। इसलिए उनकी शिक्षा पर हम भरोसा कर सकते हैं। वे ही हमें सही और ग़लत में फ़ैसला करने में मदद कर सकते हैं। उनके पिता परमेश्वर ने हमें बनाया है और हमारे अंदर एक अंतर आत्मा दी है। जब हम यीशु पर भरोसा रखते हैं तो हमें एक पवित्र आत्मा मिलती है। वो हमें सही और ग़लत के बारे में फ़र्क करना सिखाती है।

क्या आप यीशु के बारे में या कर्म के बारे में और गहराई से जानना चाहतें हैं? हमे लिखिए। चलिए हमारे साथ इस नयी मंज़िल पे।

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