प्यार की कहानी सुनो
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प्यार

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प्यार की परिभाषा 

ज़िंदग़ी भी कभी-कभी हमारा इम्तिहान लेती है। इस ज़िंदग़ी की सच्चाई काफ़ी कड़वी है। दुनिया की इस भीड़ में ‘प्यार’ को अपनी जग़ह बहुत मुश्किल से मिलती है। प्यार निभाने के लिए हमारे पास वक्त कहाँ है?

क्योंकि प्यार सिर्फ़ बोल कर जताया नहीं जाता, उसे वक्त आने पर निभाना भी पड़ता है और अगर दूसरा कोई अनजान हो तब तो शायद…

आपको मेरी बात से इत्फ़ाक़ न हो…पर…

क्या हो अगर आप सुबह-सुबह ऑफिस के लिए या कॉलेज जाने के लिए निकलें और रास्ते में आपको एक घायल इन्सान पड़ा मिले?

“मुझे देर हो रही है!”

“अरे! ये कमबख़्त बस छूट गई तो प्रॉब्लम हो जाएगी!”

इन सारे ख़्यालों से जूझते हुए, एक अनजान इन्सान को इस हालत में देखकर आपको तरस आ सकता है…पर

आप इस परिस्थिति में क्या करेंगे, यही इस बात को तय करेगा कि आप सही मायने में लोगों से प्यार करते हैं या नहीं…

आइए ऐसी ही एक प्यार की कहानी सुनते हैं।

प्यार की कहानी 

एक बार एक इन्सान सुबह-सुबह एक सफ़र पर निकला पर रास्ते में कुछ लुटेरों ने उसे लूट कर उसका सारा सामान उससे छीन लिया। लुटेरों ने उसे ख़ूब मारा और अधमरा कर, रास्ते के किनारे उसे उस हाल में छोड़कर, उसे लूट कर चले गए।

कोई भी आस-पास नहीं था उसे बचाने को या हॉस्पिटल ले जाकर उसका इलाज करवाने को…

इतने में अचानक वहाँ से एक पुजारी गुज़रता है जो सुबह-सुबह मंदिर में पूजा करने के लिए जा रहा था। दिखने में धार्मिक, भक्त गण मंदिर में उसका इंतज़ार कर रहे थे और वह समय कम होने की वजह से जल्दबाज़ी में जा रहा था और अचानक उसकी नज़र इस घायल और अधमरे इन्सान पर पड़ी। और वह…

शायद आपको लग रहा हो कि यह पुजारी ज़रुर उस घायल इन्सान की मदद करेगा क्योंकि यह मंदिर का पुजारी होने के नाते धार्मिक होगा और कष्ट में पड़े लोगों की मदद करना अपना फ़र्ज़ समझेगा!

पर ऐसा बिल्कुल न हुआ!

…और वह पुजारी अपना रास्ता नापता हुआ, उस अनजान घायल इन्सान को अनदेखा करता हुआ, आगे बढ़ गया, अपने मंदिर कि ओर, अपने धर्म का पालन करने, पूजा करने…जिस धर्म ने उसे प्यार का पाठ पढ़ाया, उसी प्यार को वह पुजारी निभा न सका!

सुबह से दोपहर हो चुकी थी। धूप की मार से इस घायल इन्सान की हालत और नाज़ुक हो रही थी।

इतने में एक पंडित वहाँ से ग़ुज़रा जो कि अपने चेलों या छात्रों को शिक्षा देने के लिए जा रहा था। एकदम सभ्य इन्सान, जिसकी शिक्षा का इन्तज़ार कई छात्र कर रहे थे। और वह…

इस बार तो ज़रुर आपको लग रहा होगा कि यह पंडित ज़रुर उस घायल इन्सान की मदद करेगा…आख़िर वह एक पंडित, एक शिक्षक है जो अपने चेलों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाता है। पर ऐसा बिल्कुल न हुआ।

…और वह पंडित भी उस घायल इन्सान को तपती धूप में अकेला छोड़कर चला गया, अपने चेलों को अच्छी-अच्छी बातें सिखाने, छात्रों को प्यार करने की शिक्षा देने, जिस प्यार को वह ख़ुद न सीख पाया…

क्या हुआ होगा उस घायल इन्सान का ?

यह रास्ता भी शायद कम ही लोग आने-जाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

दोपहर से शाम हो चुकी है।

धूप ढल चुकी है।।

अब तक शायद मर गया होगा वो…

पर उस घायल इन्सान में कुछ जान बाक़ी थी। वह साँस ले रहा था। यह कहानी भी अभी बाक़ी है…

कहानी अभी बाक़ी है मेरे दोस्त 

और फ़िर आख़िर में वहाँ से एक साधारण सा दिखने वाला इन्सान गुज़रा। शायद वह दिन ढले अपने घर जा रहा था। उसकी नज़रें उस घायल इन्सान पर पड़ती हैं।

इस बार तो आप ज़रुर सोच रहे होंगे कि भला ये साधारण सा दिखने वाला इन्सान किसी कि क्या मदद करेगा? आख़िर ये कोई पुजारी या पंडित तो नहीं…! इसकी क्या बिसात तो राह चलते किसी कि मदद करेगा, प्यार जताएगा…है ना…?

पर वह रुका, उस घायल इन्सान के नज़दीक गया, उसे उस घायल इन्सान पर दया आई और उसे उसने पानी पिलाया, उसकी मरहम-पट्टी कि, उसे हॉस्पिटल ले गया और उसका पूरा इलाज ख़ुद के ख़र्च पर करवाया !!!

अजीब बात है न…! न वो पुजारी जिसके धर्म ने प्यार का संदेश दिया, न वो पंडित जिसकी किताबों ने प्यार सिखाया, दोनों में से किसी ने उस घायल इन्सान की मदद न कि, पर उस साधारण व्यक्ति ने उस घायल इन्सान की मदद कि, जिसने धर्म और अच्छी-अच्छी बातों से परे, प्यार किस तरह निभाते हैं यह दिखाया !!!

प्यार का प्रतिरूप 

ऐसे ही किसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे, ये मैं नहीं जानता, पर कुछ ऐसा ही, और इससे कहीं बढ़कर, यीशु मसीह ने इन्सानियत के लिए किया। कोई धर्म या अच्छी बात नहीं बल्कि उन्होंनें अपना प्यार हमें दिखाया। हमारे पाप रुपी घाव को उन्होंनें भर दिया, हमारे लिए अपनी जान दी।

इसी प्यार के बारे में और अधिक जानने के लिए आप हमसे संपर्क कर सकते हैं। इस कहानी को याद रखें और इस बात को जानें कि यीशु मसीह ने हमसे सच्चा प्यार किया है।

आगे पढ़ना जारी रखें
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