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उपवास और प्रार्थना करने के तरीक़े

भगवान

उपवास और प्रार्थना करने के तरीक़े

उपवास और प्रार्थना क्या है? क्या उपवास प्रार्थना करने से हमारी मन की इच्छा पूरी हो जाएगी? उपवास और प्रार्थना कैसे करें और इसका महत्व क्या है? आइए जानें हमें बाइबिल उपवास और प्रार्थना के बारे में क्या सिखाती है?

उपवास और प्रार्थना

जहां ईश्वर का नाम आता है वहां प्रार्थना, भक्ति साधना, पूजा-अर्चना, उपवास का नाम भी आता है। और यह सारी चीजें उस एक नाम के साथ जुड़ी हैं – “ईश्वर”।आज हम उपवास और प्रार्थना के बारे में बात करेंगे ।

“उपवास और प्रार्थना ” इन दोनों का आपस में क्या संबंध है और यह किस तरह से काम करते हैं

उपवास और प्रार्थना को ईश्वर के साथ संगति और उसकी ओर ध्यान केंद्रित करने के लिए जाना जाता है। प्रार्थना और उपवास का एक समर्पित समय होना कोई प्रक्रिया नहीं है जिससे ईश्वर हमारी मनोकामनाओं को पूरा करें बल्कि उपवास और प्रार्थना के द्वारा हम परमेश्वर पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं जिससे हमें बल, बुद्धि और हमारी ज़रूरतें पूरी होने में हमें मदद मिलती है। उपवास और प्रार्थना से हम ईश्वर पर पूरी तरह से निर्भर हो जाते हैं और प्रार्थना से परमेश्वर के करीब आते हैं।

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उपवास और प्रार्थना के विषय में बाइबिल हमें क्या बताती है?

कुछ देशो मे उपवास और प्रार्थना को प्रायश्चित के दिन के रूप मे देखा गया है जब सब लोग मिलकर अपने पापो से मन फिराते और अपने जीवनो को ईश्वर को सम्रपित करते हैं – इस रिवाज़ को “उपवास का दिन” कहा गया। इसराइली सभ्यता में उपवास और प्रार्थना को सिर्फ प्रायश्चित के लिए ही इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि अलग अलग विषयों के लिए उपवास और प्रार्थना की गई जैसे  –

  1. मूसा ने 40 दिनों और 40 रातों के दौरान उपवास किया जब वे  पर्वत पर ईश्वर से इसराइल का कानून प्राप्त करने गया था।
  2. संकट या परेशानी के समय में प्रार्थना और उपवास अक्सर किया जाता था  जैसे राजा दाऊद ने उपवास किया जब उसे पता चला कि शाऊल और जोनाथन मारे गए हैं। (2 शमूएल 1:12)
  3. देश को बचाने के लिए, उसे बदलने के लिए और उसकी उन्नति के लिए भी उपवास और प्रार्थना किए गए जैसे नहेमायाह भविष्यवक्ता ने किया जब उसे पता चला की यरुशलम अभी भी खंडर है। (नहेमायाह 1:4)
  4. हम उपवास और प्रार्थना इसलिए भी करते हैं ताकि हम शारीरिक और दुनिया की और परीक्षाओं से बच सकें जैसे यीशु ने शैतान के परिक्षा करने से पहले 40 दिन और 40 रात तक उपवास किया।(मत्ती 4 :2)

उपवास कैसे करें ?

  1. मकसद: आपके उपवास करने के पीछे एक मकसद होना जरूरी है, एक विषय होना जरूरी है जिसकी वजह से आप उपवास और प्रार्थना कर रहे हैं और ईश्वर से चाहते हैं कि वह इस विषय को, इस मकसद को पूरा करें, आपकी परिस्तिथी को बदले, आपको कामयाब करें।
  2. ईश्वर की इच्छा: हमें उपवास और प्रार्थना अपनी शारीरिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए नहीं करना है बल्कि हमारे जीवन में जो ईश्वर की इच्छा है उसे पूरा होते हुए देखने के लिए और भगवान के साथ अपना रिश्ता और भी गहरा करने के लिए करना है।
  3. पहली बार उपवास: यदि आप पहली बार उपवास कर रहे हैं तो कुछ घंटों के उपवास से शुरुआत करें और इस उपवास के समय में आप प्रार्थना करें, उसकी आराधना करें, अपने उपवास के विषय को परमेश्वर के सामने रखें। उस से विनती करे और उस पर विश्वास करें कि वह इन विषयों को पूरा करने में विश्वास योग्य है।
  4. उपवास को लेकर विशेषकर करके बाइबल में ऐसा लिखा है: जब तुम उपवास करो, तो कपटियों की नाईं तुम्हारे मुंह पर उदासी न छाई रहे, क्योंकि वे अपना मुंह बनाए रहते हैं, ताकि लोग उन्हें उपवासी जानें; मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना प्रतिफल पा चुके। परन्तु जब तू उपवास करे तो अपने सिर पर तेल मल और मुंह धो। ताकि लोग नहीं परन्तु तेरा पिता जो गुप्त में है, तुझे उपवासी जाने; इस दशा में तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा। (मत्ती  6:16-18)। इसका मतलब यह है कि आप मनुष्यों को दिखाने के लिए उपवास और प्रार्थना ना करें इससे आपको कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा। पहले तो ये उपवास परमेश्वर को समर्पित हो और दूसरा यह उपवास एक मकसद, एक उद्देश्य के साथ हो।

और धीरे-धीरे आप अपने उपवास को बढ़ा सकते हैं पहले आप कुछ घंटों का उपवास कर रहे थे अब आप सुबह से शाम का उपवास कर सकते हैं और धीरे-धीरे 3 दिन का उपवास, 1 हफ्ते का उपवास, 40 दिन का उपवास, 30 दिन का उपवास इस तरह से कर सकते हैं।

यदि आप इस तरह से उपवास और प्रार्थना करेंगे तो बहुत जल्द आप उन विषयों को पूरा होता हुआ देखेंगे जिसके लिए आप उपवास कर रहे हैं।

आप उपवास और प्रार्थना के विषय में और गहराई से जानना चाहते हैं तो आप हमें संपर्क कर सकते हैं। आओ चलें इस नयीमंज़िल पे।

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