डिप्रेशन से जीत की कहानी | डिप्रेशन से बाहर कैसे निकले?
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डिप्रेशन से जीत की मेरी कहानी! | Meri Depression Se Jeet Ki Story |

डिप्रेशन से जीत की मेरी कहानी! | Meri Depression Se Jeet Ki Story |

जीवन

डिप्रेशन से जीत की मेरी कहानी! | Meri Depression Se Jeet Ki Story |

क्या आप डिप्रेशन से शर्मिंदा हैं या आप डिप्रेशन से निपटने की कोशिश कर रहे हैं? यदि आपका डिप्रेशन आपको जीवन जीने से रोक रहा है, तो आप मदद लेने में संकोच न करें। हम किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जो आपकी मदद कर सकता है!


यह अकेलापन, कई बार डिप्रेशन के रूप में हमारी ज़िंदगी में आता है। मैं भी इस डिप्रेशन का सामना कर चुका हूँ।

आओ हम डिप्रेशन, ADD, anxiety और दूसरी मानसिक रोगों के बारे में बात करते हैं। मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि  मैं आपके सवालों का जवाब दे पाऊँ।यह कुछ सवाल है जो लोग मुझसे पूछते हैं, मैं इनका जवाब यहाँ देना चाहता हूँ।

मेरे मन और दिमाग़ में आपका स्वागत है

मेरा नाम गौरव है, और मैं 23 वर्ष का हूँ। मैं एक संगीतकार हूँ, और यह मेरी कहानी है। हम सब कभी कबार गहरे अकेलेपन का सामना करते हैं। रोज़ के काम मे उलझते हुए हम अपनी ज़िंदगी में जो हमें खुशी और चैन देता है उसे शामिल करना कभी कभी भूल जाते हैं। पर क्या आपको पता है की आपके दिल और दिमाग का उचित रूप से खयाल ना रखने का क्या परिणाम हो सकता है।

आपको कब से है डिप्रेशन? मुझे कैसे पता चला कि मुझे यह तकलीफ़ हैं?

मैं स्कूल में था, 12वी कक्षा में। मुझे याद है की मेरी ज़िंदगी में काफ़ी चीज़े ठीक जा रही थी, पर मुझे एक कमी सी महसूस होती थी। एक दिन मेरी पीठ में बहुत ज़ोर से दर्द उठा, और में बिल्कुल भी हिल नहीं पाया। थोड़े दिन निकल गये पर कुछ सुधार नही आया, तब मेरे मम्मी-पापा मुझे डॉक्टर के ले के गए और मुझे पता चला कि मेरे शरीर में विटामिन डी की कमी थी।

कई महीने निकल गए, पर दवा से मुझे बिल्कुल भी चँगायी नहीं मिली। दिन-बर-दिन मेरा दर्द बढ़ता गया, मैं स्कूल भी नहीं जा पाया, और मेरे दिल और दिमाग़ में एक तरह का अंधेरा समा गया। जब भी मैं exam देने बैठता ऐसा लगता जैसे लोग मेरे कान में खुसफुसा रहे हैं। मैं कुछ भी नहीं लिख पाता था।

एक दिन मेरे डॉक्टर ने मुझे एक मनोचिकित्सक (psychiatrist) के पास भेजा। उसने मेरे साथ थोड़ी बात चीत की और अपनी समझ में मुझे एक अलग तरह की दवाई दी।जो दर्द मेरे शरीर और दिल में महीनो से था वह एक दिन मे कम हो गया! डॉक्टर ने मुझे फिर स्पष्ट रूप से समझाया की मुझे डिप्रेशन और ऐन्ग्ज़ाइअटि (Anxiety) है।

क्या मानसिक बीमारियों के लिए हमेशा दवाई लेनी ज़रूरी होती है?

बिल्कुल भी नही! सभी का दिल और दिमाग़ अलग है और विभिन्न रूप से काम करता है। सबका कष्ट अद्वितीय और अनूठा होता है, और उसका खयाल भी हमेशा एक अलग रूप से रख़ना होता हैं। मुझे दवा की ज़रूरत थी, पर काफ़ी लोगो को नही होती। सिर्फ़ काउन्सलिंग और बात चीत से भी कई लोगो को सुधार मिलता हैं।

क्या मेरे आस-पास के लोग समझ पाए की मैं किस चीज़ से गुज़र रहा हूँ?

शुरूवात में मेरे कोई भी दोस्त और जानकार मेरे साथ नही खड़े थे और मुझे मेरे परिवार के इलावा कहीं से भी सहयता और सहारा नहीं मिला। पर उन सबको माफ़ करना इतना मुश्किल नहीं था, क्योंकि  डिप्रेशन या मानसिक बीमारियों के बारे में इस से पहले मुझे भी ज़्यादा कोई समझ नहीं थी। गलती उनकी नहीं थी, गलती हैं हमारे समाज की जो शारीरिक दर्द को समझता हैं, पर मानसिक कठिनाइयों को नहीं।

क्या डिप्रेशन से गुज़रने वाले लोग हमेशा आत्म हत्या (suicide) करते हैं?

डिप्रेशन का परिणाम आत्महत्या या आत्मा-कष्ट हो सकता हैं। पर ऐसा हमेशा नहीं होता, असल में ऐसा ज़्यादातर नहीं होता है। पर अधिकांश जन ऐसी सोच का सामना करते हैं, मैने भी किया था।

सही दवाई, मेरे परिवार और दोस्तों का प्रेम, मेरी जीवन शैली में सुधार, और यीशु मसीह के अज्ञात प्रेम ने मुझे सुरक्षित और स्वस्थ रखा।

ऐसी कौनसी एक चीज़ थी जो मुझे आसानी से नहीं मिली पर मुझमे बहुत सुधार ला पाई?

काफ़ी लोग डिप्रेशन, ऐंज़ाइयटी, घबराहट, और कई और मानसिक बीमारियों के बारे में शिक्षित नही हैं, और इस वजह से कई लोगों को मुश्किल होती हैं समझने में उन लोगो को जो इस से रोज़ाना लड़ते हैं। कई बार हमें इसके उपर हसी-मज़ाक का सामना करना पढ़ता हैं क्योंकि सब  इसका महत्त्व और दर्द नहीं समझ पाते।

किसी भी और चीज़ से पहले कई बार सबसे ज़रूरी होता है बस यह जानना की हमारे दोस्त और शुभ चिंतक हमे समझने और प्यार करने की क्षमता रख्ते हैं। ऐसे दिन अक्सर आए जब मैं अपने बल पर खड़ा भी नहीं हो सका, पर मेरे चाहने वाले मेरे साथ थे जिनकी मदद से मैं ना केवल सह कर पाया परंतु मैंने अपनी स्थिति पर जीत पाई।

पर अगर मैं पूरा सच कहूँ तो यीशु के बिना यह जीवन अभी मुमकिन नहीं होता!

जितनी भी दवाई ओर जिस भी तरह से मैं ख़याल रख पाता वह काफ़ी नही था मेरे लिए।मेरी कहानी का मैं नायक नहीं, यीशु हैं

मेरे सबसे बुरे दीनो में जभ मैं बिल्कुल अकेला था, वो तब भी मेरे साथ थें। एक भी ऐसा दिन नहीं गया कि मैं स्पष्टता से कहूँ की उसने मेरा हाथ छोड़ा हो। मेरा जीवन आज है क्योंकि  यीशु मसीह मेरे जीवन में ज़िंदा हैं!

क्या आप भी इस से गुज़रतें हैं?

शायद आप सब कुछ कर चुके होंगे, पर क्या फिर भी कई दिन डिप्रेशन आपकी सहनशीलता से अधिक होती हैं? मेरी ज़िंदगी में यीशु के साथ के कारण वह भार तुच्छ महसूस हुआ और मैं डिप्रेशन से जीत गया।आप भी इस यीशु मसीह को अपने जीवन में अपना सकते है। आज ही हमसे बात कीजिए। आओ हमारे साथ इस नयीमंज़िल पे!

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